अनूठी परंपरा ‘ब्याव का बाबा’ में महिलाओं ने निभाया स्वांग, बुंदेलखंड की अनूठी विवाह परंपरा, पुरुष वेश में महिलाओं ने किया मनोरंजक प्रदर्शन
रिपोर्ट - रोशन दुबे
तेंदूखेड़ा - पत्रिका बुंदेलखंड अंचल अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, रीति-रिवाजों और अनूठी विवाह परंपराओं के लिए विशेष पहचान रखता है। इन्हीं पारंपरिक रस्मों में शामिल है ‘ब्याव का बाबा’, जिसे कई क्षेत्रों में झाड़ू-बेलन स्वांग या लठमार परंपरा के नाम से भी जाना जाता है। आधुनिकता के दौर में जहां कई लोक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह परंपरा उत्साह और उल्लास के साथ निभाई जा रही है। गुरुवार को तेंदूखेड़ा नगर से लगभग दो से तीन किलोमीटर दूर स्थित बम्हौरी पांजी गांव में इस अनूठी परंपरा का जीवंत स्वरूप देखने को मिला। गांव में विवाह समारोह के दौरान बारात के प्रस्थान के बाद महिलाओं ने पुरुषों का वेश धारण कर पारंपरिक स्वांग प्रस्तुत किया। हाथों में झाड़ू, बेलन और डंडे लेकर महिलाएं समूहों में गांव की गलियों और प्रमुख मार्गों पर निकलीं तथा विभिन्न हास्य प्रस्तुतियों के माध्यम से लोगों का मनोरंजन किया। लोक परंपरा के अनुसार जब दूल्हे की बारात विवाह स्थल के लिए रवाना हो जाती है, तब घर और गांव में मुख्य रूप से महिलाएं ही रह जाती हैं। ऐसे समय में महिलाएं पुरुषों का रूप धारण कर सामाजिक भूमिकाओं का प्रतीकात्मक निर्वहन करती हैं। इस दौरान वे हास्य-व्यंग्य से भरपूर नाटकीय प्रस्तुतियां देती हैं और विवाह समारोह के उत्साह को बनाए रखती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस रस्म का विशेष आकर्षण देखने को मिलता है। महिलाएं राहगीरों और वाहन चालकों को मजाकिया अंदाज में रोककर उनसे नेग मांगती हैं। राहगीर भी इस लोक परंपरा का आनंद लेते हुए स्वेच्छा से सहयोग राशि प्रदान करते हैं, जिसके बाद उन्हें आगे जाने दिया जाता है। पूरे आयोजन के दौरान लोकगीत, हंसी-मजाक और पारंपरिक उल्लास का वातावरण बना रहता है। स्थानीय बेनीसिह का मानना है कि ‘ब्याव का बाबा’ केवल मनोरंजन की परंपरा नहीं है, बल्कि यह महिलाओं को सामाजिक भागीदारी और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अवसर भी प्रदान करती है। यह रस्म सामुदायिक एकता, पारिवारिक सौहार्द और लोक संस्कृति के संरक्षण का संदेश देती है। विवाह जैसे पारिवारिक आयोजन को सामूहिक उत्सव में बदलने में इस परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। हालांकि बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के प्रभाव के कारण ऐसी अनेक लोक परंपराएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं, लेकिन बुंदेलखंड के कई गांवों में आज भी इन्हें पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जा रहा है। सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की लोक परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। बम्हौरी पांजी गांव में आयोजित इस पारंपरिक स्वांग ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि बुंदेलखंड की लोक संस्कृति आज भी जीवंत है और अपनी विशिष्ट पहचान को सहेजे हुए है।